Please wait...
Directions For Questions
...view full instructions
असली शत्रु तो घृणा और क्रोध हैं जिनसे हमें लड़ना है, इन्हें हराना है, इन पर विजय पानी है। यह हैं हमारे असली, पक्के शत्रु बाकी तो बस नकली ही समझो। फर्जी ही मानो उनको। ये तो हमारे जीवन में जीवन के हर मोड़ पर आते-जाते रहेंगे। हर कहीं टकरा जाएंगे। यह भी सच है, स्वभाविक है कि हम सब अच्छे मित्रों की तलाश में रहते हैं, पर यह भी सच है कि प्राय: मित्र तो मिलते नहीं, हाँ शत्रु ज़रूर आ पहँचते हैं। मैं अक्सर मज़ाक में कहता है कि यदि आप स्वार्थी बनना चाहते हों तो आपको अपने अलावा दूसरों का ध्यान रखना शुरू करना पड़ेगा। परोपकारी बने बिना आपका स्वार्थ पूरा होने से रहा। अपने घर पर ध्यान देना है तो दूसरों पर ध्यान देने लगो। अपनी चिंता करनी है तो दूसरों की चिंता करने लगो। उनकी सेवा करो। उनकी मदद में खड़े रहो। मित्र बनाते चलो। तब यदि आपको कभी कोई ज़रूरत होगी, कोई संकट आप पर आ ही गया तो समझिए आपके चारों ओर मित्र खड़े होंगे। हर तरह की दिक्कत को हल कर देने के लिए। लेकिन यदि आपने दूसरों का ध्यान नहीं रखा तो आप नुकसान में ही होंगे। निस्वार्थ प्यार ही सच्चे मित्र जुटाता है।
घृणा और क्रोध के अतिरिक्त बाकी चीज़ों को नकली शत्रु कहा गया है, क्योंकि घृणा और क्रोध-
गुलाब का फूल सुंदर होते हैं " वाक्य में अशुद्धि है -
भलो भलो कहि छोड़िए ,खोटे ग्रह जप दान।।
उपर्युक्त पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
Answered - 0
Un-answered - 15