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यदि छात्र की श्रवण-इन्द्रियों में दोष है, तो वह न भाषा सीख सकता है और न अपने मनोभावों का अभिव्यक्त कर सकता है। बालक सुनकर ही अनुकरण द्वारा भाषा ज्ञान अर्जित करता है। इससे वाचन कौशल, लेखन कौशल, पठन-पठान कौशल के विकास में भी सहायता मिलती है। यह व्यक्तित्व के विकास में भी सहायक है।