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असली शत्रु तो घृणा और क्रोध हैं जिनसे हमें लड़ना है, इन्हें हराना है, इन पर विजय पानी है। यह हैं हमारे असली, पक्के शत्रु बाकी तो बस नकली ही समझो। फर्जी ही मानो उनको। ये तो हमारे जीवन में जीवन के हर मोड़ पर आते-जाते रहेंगे। हर कहीं टकरा जाएंगे। यह भी सच है, स्वभाविक है कि हम सब अच्छे मित्रों की तलाश में रहते हैं, पर यह भी सच है कि प्राय: मित्र तो मिलते नहीं, हाँ शत्रु ज़रूर आ पहँचते हैं। मैं अक्सर मज़ाक में कहता है कि यदि आप स्वार्थी बनना चाहते हों तो आपको अपने अलावा दूसरों का ध्यान रखना शुरू करना पड़ेगा। परोपकारी बने बिना आपका स्वार्थ पूरा होने से रहा। अपने घर पर ध्यान देना है तो दूसरों पर ध्यान देने लगो। अपनी चिंता करनी है तो दूसरों की चिंता करने लगो। उनकी सेवा करो। उनकी मदद में खड़े रहो। मित्र बनाते चलो। तब यदि आपको कभी कोई ज़रूरत होगी, कोई संकट आप पर आ ही गया तो समझिए आपके चारों ओर मित्र खड़े होंगे। हर तरह की दिक्कत को हल कर देने के लिए। लेकिन यदि आपने दूसरों का ध्यान नहीं रखा तो आप नुकसान में ही होंगे। निस्वार्थ प्यार ही सच्चे मित्र जुटाता है।
घृणा और क्रोध के अतिरिक्त बाकी चीज़ों को नकली शत्रु कहा गया है, क्योंकि घृणा और क्रोध-
घृणा और क्रोध के अतिरिक्त बाकी चीज़ों को नकली शत्रु कहा गया है, क्योंकि घृणा और क्रोध नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
दूसरों पर उपकार किए बिना व्यक्ति का स्वार्थ पूरा नहीं होता।
गद्यांश से स्पष्ट है कि यदि आप स्वार्थी बनना चाहते हों तो आपको अपने अलावा दूसरों का ध्यान रखना शुरू करना पड़ेगा। परोपकारी बने बिना आपका स्वार्थ पूरा होने से रहा।
गद्यांश के अनुसार केवल अपना ध्यान रखना चाहिए कथन सही नहीं है क्योंकि यदि आप स्वार्थी बनना चाहते हों तो आपको अपने अलावा दूसरों का ध्यान रखना शुरू करना पड़ेगा। परोपकारी बने बिना आपका स्वार्थ पूरा होने से रहा। अपने घर पर ध्यान देना है तो दूसरों पर ध्यान देने लगो। अपनी चिंता करनी है तो दूसरों की चिंता करने लगो। उनकी सेवा करो।
गा कोकिल बरसा पावक कण पंक्ति सुमित्रानंदन पन्त जी की हैं पंत जी हिंदी में छायावाद युग एक प्रमुख कवि थे।
सुमित्रानंदन पण जी मुख कृतियां हैं : उच्छ्वास, पल्लव, वीणा, ग्रन्थि, गुंजन, ग्राम्या, युगांत, युगांतर, स्वर्णकिरण
शेरशाह के शासन कल में जायसी ने आश्रय प्राप्त किया था शेरशाह के काल में ही जायसी ने ‘पद्मावत’ की
रचना की थी पद्मावत हिन्दी साहित्य के अन्तर्गत सूफी परम्परा का प्रसिद्ध महाकाव्य है
गुलाब का फूल सुंदर होते हैं " वाक्य में अशुद्धि है -
वाक्य में करका संबंधी अशुद्धि है -
गुलाब का फूल सुंदर होते हैं - गुलाब के फूल सुंदर होते हैं
कारक संबंधी अशुद्धियाँ-कारक चिह्नों का सही प्रयोग न करने से वाक्य में कारक संबंधी प्रायः अशुद्धियाँ आ जाती हैं, जिससे वाक्य अटपटा-सा लगने लगता है।
भलो भलो कहि छोड़िए ,खोटे ग्रह जप दान।।
उपर्युक्त पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
यहां पूर्वार्द्ध में उपमेय वाक्य और उत्तरार्द्ध में उपमान वाक्य है। इनमें 'सम्मान होना' और 'जपदान करना' ये दो भिन्न -भिन्न धर्म कहे गए हैं। इन दोनों में बिम्ब -प्रतिबिम्ब भाव है। अत: दृष्टान्त अलंकार है।दृष्टान्त अलंकार - जहां उपमेय , उपमान और साधारण धर्म का बिम्ब -प्रतिबिम्ब भाव होता है।
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