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तत्सम शब्द- वे शब्द जो संस्कृत से सीधे ही ग्रहण कर लिए हैं और आज भी संस्कृत के मूल शब्द की भाँति ही हिंदी में प्रयुक्त होते हैं।
तद्भव शब्द- वे शब्द जो संस्कृत से सीधे ग्रहण ना करके कुछ परिवर्तन के साथ ग्रहण किये गए हैं। जैसे दधि को दही, दुग्धम् को दूध ।
इसका वाक्य प्रयोग- सड़क कहाँ जाती है?।
जबकि अन्य सभी शब्द पुल्लिंग है।
पंखा चलता है,
पेड़ हिलता है,
साँप जाता है।
मिश्रित वाक्य- जिन वाक्यों में एक मुख्य उपवाक्य ( विधेय ) एवं कई आश्रित ( उद्देश्य )उपवाक्य हो तथा आपस में 'कि, जो, क्योंकि, जितना-उतना, जब-तब, जैसा-वैसा आदि से मिश्रित हो।
● ईर्ष्या - ईर्षा ( तद्भव )
● तत्सम दो शब्दों से मिलकर बना है – तत +सम , जिसका अर्थ होता है ज्यों का त्यों। जिन शब्दों को संस्कृत से बिना किसी परिवर्तन के ले लिया जाता है उन्हें तत्सम शब्द कहते हैं। इनमें ध्वनि परिवर्तन नहीं होता है।
● विदेशज / विदेशी / आगत = ( विदेश + ज ) शब्द का अर्थ है - ' विदेश में जन्मा ' । आगत शब्द का अर्थ है - ' आया हुआ ' । हिंदी में अनेक शब्द ऐसे हैं जो हैं तो विदेशी मूल के , पर परस्पर संपर्क के कारण यहाँ प्रचलित हो गये हैं । अतः अन्य देश की भाषा से आये हुए शब्द विदेशज शब्द कहलाते हैं ।
सम्भाव्य भविष्यत काल:-क्रिया के जिस रूप से उसके भविष्य में होने की संभावना का पता चलता है, उसे सम्भाव्य भविष्यत काल कहते हैं।
"कदाचित शाम तक वो वापस आ जाएँ"
उपर्युक्त वाक्य में क्रिया के भविष्य में होने की संभावना है। ये पूर्ण रूप से होंगी, ऐसा निश्चित नहीं होता।
प्रस्तुत वाक्य में ' मात्र ' शब्द किस प्रकार का अव्यय है ?
' मात्र ' शब्द निपात अव्यय का बोधक है ।
जो अव्यय शब्द किसी शब्द या पद के पीछे लगकर उसके अर्थ में विशेष बल लाते हैं उन्हें निपात अव्यय कहते हैं। इसे अवधारक शब्द भी कहते हैं। जहाँ पर ही , भी , तो , तक ,मात्र , भर , मत , सा , जी , केवल आते हैं वहाँ पर निपात अव्यय होता है।
दिए गए विकल्पों में ग वर्ण अघोष वर्ण नहीं है।जिन वर्णों के उच्चारण में नाद की जगह केवल श्वाँस का उपयोग होता हैं, उन्हे अघोष वर्ण कहते हैं। इनकी संख्या 13 होती है। जो इस प्रकार है - क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ, श, ष, स
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