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Hindi Test 63
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Hindi Test 63
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    निर्देश: गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए ।

    भगतसिंह की फांसी की सजा सुन कर, भारतवासी स्तम्भा थे। क्योकि प्रत्येक व्यक्ति भगतसिंह को अपने ही आत्मीय जान समझता था। कुछ वकीलों ने जब उन्हें यह परामर्श दिया कि यदि वे वायसराय को क्षमायाचना का पत्र भेजें, तो शायद सजा में कुछ छुट मिल जाए तो भगतसिंह ने हंसकर इस परामर्श को टाल दिया वे बोले –“मेरे देश पर अत्याचार करने वाली सरकार से मैं ‘क्षमायाचना कैसे कर सकता हूँ? मुझे गर्व है कि मैं अपने देश के लिए फांसी पर चढ़ने जा रहा हूँ। इस तरह अनेक विरोधों के बाद भी फाँसी का दिन टल नहीं सका। उनकी माता विधावती जी पुत्र से मिलने आई तो भगत सिंह ने बड़े गर्व से कहा –“बेबे आप मेरी लाश लेने मत आना, कहीं आपकी आँखों में आँसू आ गए तो लोग कहेंगे कि भगतसिंह की माँ रो रही है।”
    24 मार्च सन 1931 को फाँसी का दिन था, पर अंग्रेज सरकार जानती थी कि भगतसिंह के भक्त दिन चढ़ते ही जेल के दरवाजे पर आ जुटेंगे, अत: सभी नियमों को तोड़ कर 23 मार्च की रात को ही उन तीनों को फाँसी दे दी गई। परंतु आश्चर्य की बात यह है कि फाँसी का फंदा चूमने के पहले भगत सिंह का वजन बढ़ गया था ।
    रातों-रात रावी तट पर इन अमर शहीदों की लाशों को जला दिया गया। अगली सुबह जब परिवारजन व अन्य व्यक्ति वहाँ पहुँचे, तो केवल भस्म ही शेष थी।

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    किसकी फाँसी की सजा सुनकर भारतवासी स्तम्भ थे ?
    Solutions
    भगत सिंह की फांसी की सजा सुनकर भारतवासी स्तम्भा थे, क्योंकि भारतवासी भगत सिंह को अपने आत्मीय जान समझता था।
  • Question 2/9
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    निर्देश: गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए ।

    भगतसिंह की फांसी की सजा सुन कर, भारतवासी स्तम्भा थे। क्योकि प्रत्येक व्यक्ति भगतसिंह को अपने ही आत्मीय जान समझता था। कुछ वकीलों ने जब उन्हें यह परामर्श दिया कि यदि वे वायसराय को क्षमायाचना का पत्र भेजें, तो शायद सजा में कुछ छुट मिल जाए तो भगतसिंह ने हंसकर इस परामर्श को टाल दिया वे बोले –“मेरे देश पर अत्याचार करने वाली सरकार से मैं ‘क्षमायाचना कैसे कर सकता हूँ? मुझे गर्व है कि मैं अपने देश के लिए फांसी पर चढ़ने जा रहा हूँ। इस तरह अनेक विरोधों के बाद भी फाँसी का दिन टल नहीं सका। उनकी माता विधावती जी पुत्र से मिलने आई तो भगत सिंह ने बड़े गर्व से कहा –“बेबे आप मेरी लाश लेने मत आना, कहीं आपकी आँखों में आँसू आ गए तो लोग कहेंगे कि भगतसिंह की माँ रो रही है।”
    24 मार्च सन 1931 को फाँसी का दिन था, पर अंग्रेज सरकार जानती थी कि भगतसिंह के भक्त दिन चढ़ते ही जेल के दरवाजे पर आ जुटेंगे, अत: सभी नियमों को तोड़ कर 23 मार्च की रात को ही उन तीनों को फाँसी दे दी गई। परंतु आश्चर्य की बात यह है कि फाँसी का फंदा चूमने के पहले भगत सिंह का वजन बढ़ गया था ।
    रातों-रात रावी तट पर इन अमर शहीदों की लाशों को जला दिया गया। अगली सुबह जब परिवारजन व अन्य व्यक्ति वहाँ पहुँचे, तो केवल भस्म ही शेष थी।

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    "वकील" शब्द में कौन सी संज्ञा है?
    Solutions
    वकील शब्द में जातिवाचक संज्ञा है।
    जातिवाचक संज्ञा किसी प्राणी या वस्तु की सम्पूर्ण जाति का बोध कराती है। जैसे – वकील, लेखक, विधार्थी आदि।
  • Question 3/9
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    निर्देश: गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए ।

    भगतसिंह की फांसी की सजा सुन कर, भारतवासी स्तम्भा थे। क्योकि प्रत्येक व्यक्ति भगतसिंह को अपने ही आत्मीय जान समझता था। कुछ वकीलों ने जब उन्हें यह परामर्श दिया कि यदि वे वायसराय को क्षमायाचना का पत्र भेजें, तो शायद सजा में कुछ छुट मिल जाए तो भगतसिंह ने हंसकर इस परामर्श को टाल दिया वे बोले –“मेरे देश पर अत्याचार करने वाली सरकार से मैं ‘क्षमायाचना कैसे कर सकता हूँ? मुझे गर्व है कि मैं अपने देश के लिए फांसी पर चढ़ने जा रहा हूँ। इस तरह अनेक विरोधों के बाद भी फाँसी का दिन टल नहीं सका। उनकी माता विधावती जी पुत्र से मिलने आई तो भगत सिंह ने बड़े गर्व से कहा –“बेबे आप मेरी लाश लेने मत आना, कहीं आपकी आँखों में आँसू आ गए तो लोग कहेंगे कि भगतसिंह की माँ रो रही है।”
    24 मार्च सन 1931 को फाँसी का दिन था, पर अंग्रेज सरकार जानती थी कि भगतसिंह के भक्त दिन चढ़ते ही जेल के दरवाजे पर आ जुटेंगे, अत: सभी नियमों को तोड़ कर 23 मार्च की रात को ही उन तीनों को फाँसी दे दी गई। परंतु आश्चर्य की बात यह है कि फाँसी का फंदा चूमने के पहले भगत सिंह का वजन बढ़ गया था ।
    रातों-रात रावी तट पर इन अमर शहीदों की लाशों को जला दिया गया। अगली सुबह जब परिवारजन व अन्य व्यक्ति वहाँ पहुँचे, तो केवल भस्म ही शेष थी।

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    भगत सिंह को वायसराय के पास पत्र भेजने को किसने कहा था ?
    Solutions
    भगत सिंह को वायसराय के पास क्षमा याचना पत्र भेजने का परामर्श वकील ने दिया जिससे हो सकता है कि शायद सजा में कुछ छूट मिल जाए तो भगतसिंह ने हंसकर इस परामर्श को टाल दिया।
  • Question 4/9
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    भगतसिंह की फांसी की सजा सुन कर, भारतवासी स्तम्भा थे। क्योकि प्रत्येक व्यक्ति भगतसिंह को अपने ही आत्मीय जान समझता था। कुछ वकीलों ने जब उन्हें यह परामर्श दिया कि यदि वे वायसराय को क्षमायाचना का पत्र भेजें, तो शायद सजा में कुछ छुट मिल जाए तो भगतसिंह ने हंसकर इस परामर्श को टाल दिया वे बोले –“मेरे देश पर अत्याचार करने वाली सरकार से मैं ‘क्षमायाचना कैसे कर सकता हूँ? मुझे गर्व है कि मैं अपने देश के लिए फांसी पर चढ़ने जा रहा हूँ। इस तरह अनेक विरोधों के बाद भी फाँसी का दिन टल नहीं सका। उनकी माता विधावती जी पुत्र से मिलने आई तो भगत सिंह ने बड़े गर्व से कहा –“बेबे आप मेरी लाश लेने मत आना, कहीं आपकी आँखों में आँसू आ गए तो लोग कहेंगे कि भगतसिंह की माँ रो रही है।”
    24 मार्च सन 1931 को फाँसी का दिन था, पर अंग्रेज सरकार जानती थी कि भगतसिंह के भक्त दिन चढ़ते ही जेल के दरवाजे पर आ जुटेंगे, अत: सभी नियमों को तोड़ कर 23 मार्च की रात को ही उन तीनों को फाँसी दे दी गई। परंतु आश्चर्य की बात यह है कि फाँसी का फंदा चूमने के पहले भगत सिंह का वजन बढ़ गया था ।
    रातों-रात रावी तट पर इन अमर शहीदों की लाशों को जला दिया गया। अगली सुबह जब परिवारजन व अन्य व्यक्ति वहाँ पहुँचे, तो केवल भस्म ही शेष थी।

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    "अत्याचार" शब्द में सन्धि है -
    Solutions
    अत्याचार शब्द में यण सन्धि है।
    जब इ, ई अथवा उ, ऊ का मेल विजातीय स्वर से होने पर इ का य और उ का व् हो जाता है। जैसे – इत्यादि, अत्यंत आदि।
    अत्याचार का विच्छेद होता है - अति + आचार 
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    भगतसिंह की फांसी की सजा सुन कर, भारतवासी स्तम्भा थे। क्योकि प्रत्येक व्यक्ति भगतसिंह को अपने ही आत्मीय जान समझता था। कुछ वकीलों ने जब उन्हें यह परामर्श दिया कि यदि वे वायसराय को क्षमायाचना का पत्र भेजें, तो शायद सजा में कुछ छुट मिल जाए तो भगतसिंह ने हंसकर इस परामर्श को टाल दिया वे बोले –“मेरे देश पर अत्याचार करने वाली सरकार से मैं ‘क्षमायाचना कैसे कर सकता हूँ? मुझे गर्व है कि मैं अपने देश के लिए फांसी पर चढ़ने जा रहा हूँ। इस तरह अनेक विरोधों के बाद भी फाँसी का दिन टल नहीं सका। उनकी माता विधावती जी पुत्र से मिलने आई तो भगत सिंह ने बड़े गर्व से कहा –“बेबे आप मेरी लाश लेने मत आना, कहीं आपकी आँखों में आँसू आ गए तो लोग कहेंगे कि भगतसिंह की माँ रो रही है।”
    24 मार्च सन 1931 को फाँसी का दिन था, पर अंग्रेज सरकार जानती थी कि भगतसिंह के भक्त दिन चढ़ते ही जेल के दरवाजे पर आ जुटेंगे, अत: सभी नियमों को तोड़ कर 23 मार्च की रात को ही उन तीनों को फाँसी दे दी गई। परंतु आश्चर्य की बात यह है कि फाँसी का फंदा चूमने के पहले भगत सिंह का वजन बढ़ गया था ।
    रातों-रात रावी तट पर इन अमर शहीदों की लाशों को जला दिया गया। अगली सुबह जब परिवारजन व अन्य व्यक्ति वहाँ पहुँचे, तो केवल भस्म ही शेष थी।

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    भगत सिंह की माँ का क्या नाम था?
    Solutions
    भगत सिंह की माँ नाम विधावती था।  जब भगत सिंह की माँ अपने पुत्र से मिलने आयी तो भगत सिंह ने कहा माँ आप मेरी लाश मत लेने आना नहीं तो आपके आंसू देखकर लोग कहेगे, भगत सिंह की माँ रो रही है। 
  • Question 6/9
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    भगतसिंह की फांसी की सजा सुन कर, भारतवासी स्तम्भा थे। क्योकि प्रत्येक व्यक्ति भगतसिंह को अपने ही आत्मीय जान समझता था। कुछ वकीलों ने जब उन्हें यह परामर्श दिया कि यदि वे वायसराय को क्षमायाचना का पत्र भेजें, तो शायद सजा में कुछ छुट मिल जाए तो भगतसिंह ने हंसकर इस परामर्श को टाल दिया वे बोले –“मेरे देश पर अत्याचार करने वाली सरकार से मैं ‘क्षमायाचना कैसे कर सकता हूँ? मुझे गर्व है कि मैं अपने देश के लिए फांसी पर चढ़ने जा रहा हूँ। इस तरह अनेक विरोधों के बाद भी फाँसी का दिन टल नहीं सका। उनकी माता विधावती जी पुत्र से मिलने आई तो भगत सिंह ने बड़े गर्व से कहा –“बेबे आप मेरी लाश लेने मत आना, कहीं आपकी आँखों में आँसू आ गए तो लोग कहेंगे कि भगतसिंह की माँ रो रही है।”
    24 मार्च सन 1931 को फाँसी का दिन था, पर अंग्रेज सरकार जानती थी कि भगतसिंह के भक्त दिन चढ़ते ही जेल के दरवाजे पर आ जुटेंगे, अत: सभी नियमों को तोड़ कर 23 मार्च की रात को ही उन तीनों को फाँसी दे दी गई। परंतु आश्चर्य की बात यह है कि फाँसी का फंदा चूमने के पहले भगत सिंह का वजन बढ़ गया था ।
    रातों-रात रावी तट पर इन अमर शहीदों की लाशों को जला दिया गया। अगली सुबह जब परिवारजन व अन्य व्यक्ति वहाँ पहुँचे, तो केवल भस्म ही शेष थी।

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    गद्यांश में प्रयुक्त "गर्व" शब्द का पर्यायवाची  है।
    Solutions
    पर्यायवाची का संधि विच्छेद पर्याय+वाची जहा 'पर्याय' का अर्थ है- 'समान' तथा 'वाची' का अर्थ है- 'बोले जाने वाले' अर्थात जिन शब्दों का अर्थ एक जैसा होता है, उन्हें 'पर्यायवाची शब्द' कहते हैं।
    गर्व का पर्यायवाची शब्द अभिमान है। जबकि नम्रता, विनम्र, नम्र, गर्व का विलोम शब्द है।
    गर्व के अन्य पर्यायवाची शब्द है  घमण्ड, दर्घ, अभिमान, आदि है ।
  • Question 7/9
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    भगतसिंह की फांसी की सजा सुन कर, भारतवासी स्तम्भा थे। क्योकि प्रत्येक व्यक्ति भगतसिंह को अपने ही आत्मीय जान समझता था। कुछ वकीलों ने जब उन्हें यह परामर्श दिया कि यदि वे वायसराय को क्षमायाचना का पत्र भेजें, तो शायद सजा में कुछ छुट मिल जाए तो भगतसिंह ने हंसकर इस परामर्श को टाल दिया वे बोले –“मेरे देश पर अत्याचार करने वाली सरकार से मैं ‘क्षमायाचना कैसे कर सकता हूँ? मुझे गर्व है कि मैं अपने देश के लिए फांसी पर चढ़ने जा रहा हूँ। इस तरह अनेक विरोधों के बाद भी फाँसी का दिन टल नहीं सका। उनकी माता विधावती जी पुत्र से मिलने आई तो भगत सिंह ने बड़े गर्व से कहा –“बेबे आप मेरी लाश लेने मत आना, कहीं आपकी आँखों में आँसू आ गए तो लोग कहेंगे कि भगतसिंह की माँ रो रही है।”
    24 मार्च सन 1931 को फाँसी का दिन था, पर अंग्रेज सरकार जानती थी कि भगतसिंह के भक्त दिन चढ़ते ही जेल के दरवाजे पर आ जुटेंगे, अत: सभी नियमों को तोड़ कर 23 मार्च की रात को ही उन तीनों को फाँसी दे दी गई। परंतु आश्चर्य की बात यह है कि फाँसी का फंदा चूमने के पहले भगत सिंह का वजन बढ़ गया था ।
    रातों-रात रावी तट पर इन अमर शहीदों की लाशों को जला दिया गया। अगली सुबह जब परिवारजन व अन्य व्यक्ति वहाँ पहुँचे, तो केवल भस्म ही शेष थी।

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    भगत सिंह को किस तारीख पर फाँसी दी गयी ?
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    भगत सिंह को 23 मार्च को फाँसी दी गयी । जबकि 24 मार्च सन 1931को फाँसी का दिन था अंग्रेज सरकार यह जानते थे कि भगतसिंह के भक्त दिन चढने पर जेल के दरवाजे पर आ जुटेगे इसलिए एक दिन पहले ही उन्हें फासी दे दी ।
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    भगतसिंह की फांसी की सजा सुन कर, भारतवासी स्तम्भा थे। क्योकि प्रत्येक व्यक्ति भगतसिंह को अपने ही आत्मीय जान समझता था। कुछ वकीलों ने जब उन्हें यह परामर्श दिया कि यदि वे वायसराय को क्षमायाचना का पत्र भेजें, तो शायद सजा में कुछ छुट मिल जाए तो भगतसिंह ने हंसकर इस परामर्श को टाल दिया वे बोले –“मेरे देश पर अत्याचार करने वाली सरकार से मैं ‘क्षमायाचना कैसे कर सकता हूँ? मुझे गर्व है कि मैं अपने देश के लिए फांसी पर चढ़ने जा रहा हूँ। इस तरह अनेक विरोधों के बाद भी फाँसी का दिन टल नहीं सका। उनकी माता विधावती जी पुत्र से मिलने आई तो भगत सिंह ने बड़े गर्व से कहा –“बेबे आप मेरी लाश लेने मत आना, कहीं आपकी आँखों में आँसू आ गए तो लोग कहेंगे कि भगतसिंह की माँ रो रही है।”
    24 मार्च सन 1931 को फाँसी का दिन था, पर अंग्रेज सरकार जानती थी कि भगतसिंह के भक्त दिन चढ़ते ही जेल के दरवाजे पर आ जुटेंगे, अत: सभी नियमों को तोड़ कर 23 मार्च की रात को ही उन तीनों को फाँसी दे दी गई। परंतु आश्चर्य की बात यह है कि फाँसी का फंदा चूमने के पहले भगत सिंह का वजन बढ़ गया था ।
    रातों-रात रावी तट पर इन अमर शहीदों की लाशों को जला दिया गया। अगली सुबह जब परिवारजन व अन्य व्यक्ति वहाँ पहुँचे, तो केवल भस्म ही शेष थी।

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    फांसी का फंदा चूमने के पहले किसका वजन बढ़ गया था?
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    फांसी का फंदा चुमने के पहले भगतसिंह को वजन बढ़ गया था।  क्योंकि उन्हें अपने मातृभूमि के प्रति अपने आप को न्यौछावर करने में गर्व अनुभव हो रहा था। 
  • Question 9/9
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    भगतसिंह की फांसी की सजा सुन कर, भारतवासी स्तम्भा थे। क्योकि प्रत्येक व्यक्ति भगतसिंह को अपने ही आत्मीय जान समझता था। कुछ वकीलों ने जब उन्हें यह परामर्श दिया कि यदि वे वायसराय को क्षमायाचना का पत्र भेजें, तो शायद सजा में कुछ छुट मिल जाए तो भगतसिंह ने हंसकर इस परामर्श को टाल दिया वे बोले –“मेरे देश पर अत्याचार करने वाली सरकार से मैं ‘क्षमायाचना कैसे कर सकता हूँ? मुझे गर्व है कि मैं अपने देश के लिए फांसी पर चढ़ने जा रहा हूँ। इस तरह अनेक विरोधों के बाद भी फाँसी का दिन टल नहीं सका। उनकी माता विधावती जी पुत्र से मिलने आई तो भगत सिंह ने बड़े गर्व से कहा –“बेबे आप मेरी लाश लेने मत आना, कहीं आपकी आँखों में आँसू आ गए तो लोग कहेंगे कि भगतसिंह की माँ रो रही है।”
    24 मार्च सन 1931 को फाँसी का दिन था, पर अंग्रेज सरकार जानती थी कि भगतसिंह के भक्त दिन चढ़ते ही जेल के दरवाजे पर आ जुटेंगे, अत: सभी नियमों को तोड़ कर 23 मार्च की रात को ही उन तीनों को फाँसी दे दी गई। परंतु आश्चर्य की बात यह है कि फाँसी का फंदा चूमने के पहले भगत सिंह का वजन बढ़ गया था ।
    रातों-रात रावी तट पर इन अमर शहीदों की लाशों को जला दिया गया। अगली सुबह जब परिवारजन व अन्य व्यक्ति वहाँ पहुँचे, तो केवल भस्म ही शेष थी।

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    भगत सिंह का दाह संस्कार किस नदी के तट पर हुआ?
    Solutions
    भगत सिंह का दाह संस्कार रातों-रात “रावी” नदी के किनारे किया गया और सभी अमर शहीदों को जला दिया गया।  और सुबह परिजनों के आने पर उन्हें केवल भस्म ही मिली।
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