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Hindi Test 67
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Hindi Test 67
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  • Question 1/9
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    Directions For Questions

    निम्नलिखित गघांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनिए :-

    आज शिक्षक की भूमिका उपदेशक या ज्ञानदाता की-सी नहीं रही वह तो मात्र एक प्रेरक है की शिक्षार्थी स्वयं सीख सकें उनके किशोर मानस को ध्यान में रखकर शिक्षक को अपने शिक्षण कार्य के दौरान अध्ययन अध्यापन की परनपारगत विधियों में दो कदम आगे जाना पड़ेगा, ताकि शिक्षार्थी समकालीन यथार्थ और दिन-प्रतिदिन बदलते जीवन की चुनौतियों के बीच मानव-मूल्यों के प्रति अडिग आस्था बनाए रखने की प्रेरणा ग्रहण कर सके पाठगत बाधाओं को दूर कराते हुए विधार्थियों की सहभागिता को सही दिशा प्रदान करने का कार्य शिक्षक ही कर सकता है

    भाषा शिक्षण की कोई एक विधि नहीं हो सकती जैसे मध्यकालीन कविता में अलंकार, चंदविधान, तुक आदि के प्रति आग्रह था किन्तु आज लय और प्रवाह का महत्व है कविता पढ़ाते समय कवि की युग चेतना के प्रतिसजगता समझना आवश्यक है निबंध में लेखक के दृष्टिकोण और भाषा-शैली का महत्व है और शिक्षार्थी को अर्थग्रहण की योग्यता का विकास जरूरी है कहानी के भीतर बुनी अनेक कहानियों को पहचानने और उन सूत्रों को पल्लवित करने का अभ्यास शिक्षार्थी की कल्पना और अभिव्यक्ति कौशल को बढ़ाने के लिए उपयोगी हो सकता है कभी-कभी कहानी का नाटक में विधा परिवर्तन कर उसका मंचन किया जा सकता है

    मूल्यांकन वस्तुत: सीखने की ही एक प्राणाली है, ऐसी प्रणाली जो रंटत प्रणाली से मुक्ति दिला सके परंपरागत साँचे का अनुपालन न करे, अपना ढाँचा निर्मित कर सके इसलिए यह गाँठ बाँध लेना आवश्यक है कि भाषा और साहित्य के प्रश्न बंधे-बंधाए उत्तरों तक सीमित नहीं हो सकते शिक्षक पूर्वनिर्धारित उत्तर कि अपेक्षा नहीं कर सकता विधार्थियों के उत्तर साँचे से हटकर किन्तु तर्क संगत हो सकते हैं और सही भी इस खुलेपन की चुनौती को स्वीकारना आवश्यक

    है |

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    मूल्यांकन के बारे में सत्य नहीं है?

    Solutions

    गद्यांश से, मूल्यांकन के बारे में असत्य कथन यह है कि इसका एक निश्चित ढाँचा होता है यह शिखने की एक ऐसी प्रणाली है जो रटन्त  क्रिया से मुक्ति दिलाती है तथा परंपरागत सांचे का अनुपालन करने को बाध्य नहीं कराती है
    मूल्यांकन वस्तुत: सीखने की ही एक प्राणाली है, ऐसी प्रणाली जो रंटत प्रणाली से मुक्ति दिला सके। परंपरागत साँचे का अनुपालन न करे, अपना ढाँचा निर्मित कर सके।

  • Question 2/9
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    Directions For Questions

    निम्नलिखित गघांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनिए :-

    आज शिक्षक की भूमिका उपदेशक या ज्ञानदाता की-सी नहीं रही वह तो मात्र एक प्रेरक है की शिक्षार्थी स्वयं सीख सकें उनके किशोर मानस को ध्यान में रखकर शिक्षक को अपने शिक्षण कार्य के दौरान अध्ययन अध्यापन की परनपारगत विधियों में दो कदम आगे जाना पड़ेगा, ताकि शिक्षार्थी समकालीन यथार्थ और दिन-प्रतिदिन बदलते जीवन की चुनौतियों के बीच मानव-मूल्यों के प्रति अडिग आस्था बनाए रखने की प्रेरणा ग्रहण कर सके पाठगत बाधाओं को दूर कराते हुए विधार्थियों की सहभागिता को सही दिशा प्रदान करने का कार्य शिक्षक ही कर सकता है

    भाषा शिक्षण की कोई एक विधि नहीं हो सकती जैसे मध्यकालीन कविता में अलंकार, चंदविधान, तुक आदि के प्रति आग्रह था किन्तु आज लय और प्रवाह का महत्व है कविता पढ़ाते समय कवि की युग चेतना के प्रतिसजगता समझना आवश्यक है निबंध में लेखक के दृष्टिकोण और भाषा-शैली का महत्व है और शिक्षार्थी को अर्थग्रहण की योग्यता का विकास जरूरी है कहानी के भीतर बुनी अनेक कहानियों को पहचानने और उन सूत्रों को पल्लवित करने का अभ्यास शिक्षार्थी की कल्पना और अभिव्यक्ति कौशल को बढ़ाने के लिए उपयोगी हो सकता है कभी-कभी कहानी का नाटक में विधा परिवर्तन कर उसका मंचन किया जा सकता है

    मूल्यांकन वस्तुत: सीखने की ही एक प्राणाली है, ऐसी प्रणाली जो रंटत प्रणाली से मुक्ति दिला सके परंपरागत साँचे का अनुपालन न करे, अपना ढाँचा निर्मित कर सके इसलिए यह गाँठ बाँध लेना आवश्यक है कि भाषा और साहित्य के प्रश्न बंधे-बंधाए उत्तरों तक सीमित नहीं हो सकते शिक्षक पूर्वनिर्धारित उत्तर कि अपेक्षा नहीं कर सकता विधार्थियों के उत्तर साँचे से हटकर किन्तु तर्क संगत हो सकते हैं और सही भी इस खुलेपन की चुनौती को स्वीकारना आवश्यक

    है |

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    समास की दृष्टि से कौन-सा पद शेष से भिन्न है?
    Solutions

    समास - समास का तात्पर्य होता है – संछिप्तीकरण। इसका शाब्दिक अर्थ होता है छोटा रूप। अथार्त जब दो या दो से अधिक शब्दों से मिलकर जो नया और छोटा शब्द बनता है उस शब्द को समास कहते हैं।
    समास की द्रष्टि से दिन-प्रतिदिन शेष से भिन्न है।

  • Question 3/9
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    निम्नलिखित गघांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनिए :-

    आज शिक्षक की भूमिका उपदेशक या ज्ञानदाता की-सी नहीं रही वह तो मात्र एक प्रेरक है की शिक्षार्थी स्वयं सीख सकें उनके किशोर मानस को ध्यान में रखकर शिक्षक को अपने शिक्षण कार्य के दौरान अध्ययन अध्यापन की परनपारगत विधियों में दो कदम आगे जाना पड़ेगा, ताकि शिक्षार्थी समकालीन यथार्थ और दिन-प्रतिदिन बदलते जीवन की चुनौतियों के बीच मानव-मूल्यों के प्रति अडिग आस्था बनाए रखने की प्रेरणा ग्रहण कर सके पाठगत बाधाओं को दूर कराते हुए विधार्थियों की सहभागिता को सही दिशा प्रदान करने का कार्य शिक्षक ही कर सकता है

    भाषा शिक्षण की कोई एक विधि नहीं हो सकती जैसे मध्यकालीन कविता में अलंकार, चंदविधान, तुक आदि के प्रति आग्रह था किन्तु आज लय और प्रवाह का महत्व है कविता पढ़ाते समय कवि की युग चेतना के प्रतिसजगता समझना आवश्यक है निबंध में लेखक के दृष्टिकोण और भाषा-शैली का महत्व है और शिक्षार्थी को अर्थग्रहण की योग्यता का विकास जरूरी है कहानी के भीतर बुनी अनेक कहानियों को पहचानने और उन सूत्रों को पल्लवित करने का अभ्यास शिक्षार्थी की कल्पना और अभिव्यक्ति कौशल को बढ़ाने के लिए उपयोगी हो सकता है कभी-कभी कहानी का नाटक में विधा परिवर्तन कर उसका मंचन किया जा सकता है

    मूल्यांकन वस्तुत: सीखने की ही एक प्राणाली है, ऐसी प्रणाली जो रंटत प्रणाली से मुक्ति दिला सके परंपरागत साँचे का अनुपालन न करे, अपना ढाँचा निर्मित कर सके इसलिए यह गाँठ बाँध लेना आवश्यक है कि भाषा और साहित्य के प्रश्न बंधे-बंधाए उत्तरों तक सीमित नहीं हो सकते शिक्षक पूर्वनिर्धारित उत्तर कि अपेक्षा नहीं कर सकता विधार्थियों के उत्तर साँचे से हटकर किन्तु तर्क संगत हो सकते हैं और सही भी इस खुलेपन की चुनौती को स्वीकारना आवश्यक

    है |

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    विधार्थीके लिए अनुच्छेद में प्रयुक्त अन्य पर्यायवाची शब्द हैं
    Solutions

    पर्यायवाची शब्द - 'पर्याय' का अर्थ है- 'समान' तथा 'वाची' का अर्थ है- 'बोले जाने वाले' अर्थात जिन शब्दों का अर्थ एक जैसा होता है, उन्हें 'पर्यायवाची शब्द' कहते हैं।
    विधार्थीके लिए अनुच्छेद में प्रयुक्त अन्य पर्यायवाची शब्द - शिक्षार्थी, छात्र
    अन्य शब्द गद्यांश के आधार पर विद्यार्थी के पर्यायवाची शब्द नहीं है

  • Question 4/9
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    Directions For Questions

    निम्नलिखित गघांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनिए :-

    आज शिक्षक की भूमिका उपदेशक या ज्ञानदाता की-सी नहीं रही वह तो मात्र एक प्रेरक है की शिक्षार्थी स्वयं सीख सकें उनके किशोर मानस को ध्यान में रखकर शिक्षक को अपने शिक्षण कार्य के दौरान अध्ययन अध्यापन की परनपारगत विधियों में दो कदम आगे जाना पड़ेगा, ताकि शिक्षार्थी समकालीन यथार्थ और दिन-प्रतिदिन बदलते जीवन की चुनौतियों के बीच मानव-मूल्यों के प्रति अडिग आस्था बनाए रखने की प्रेरणा ग्रहण कर सके पाठगत बाधाओं को दूर कराते हुए विधार्थियों की सहभागिता को सही दिशा प्रदान करने का कार्य शिक्षक ही कर सकता है

    भाषा शिक्षण की कोई एक विधि नहीं हो सकती जैसे मध्यकालीन कविता में अलंकार, चंदविधान, तुक आदि के प्रति आग्रह था किन्तु आज लय और प्रवाह का महत्व है कविता पढ़ाते समय कवि की युग चेतना के प्रतिसजगता समझना आवश्यक है निबंध में लेखक के दृष्टिकोण और भाषा-शैली का महत्व है और शिक्षार्थी को अर्थग्रहण की योग्यता का विकास जरूरी है कहानी के भीतर बुनी अनेक कहानियों को पहचानने और उन सूत्रों को पल्लवित करने का अभ्यास शिक्षार्थी की कल्पना और अभिव्यक्ति कौशल को बढ़ाने के लिए उपयोगी हो सकता है कभी-कभी कहानी का नाटक में विधा परिवर्तन कर उसका मंचन किया जा सकता है

    मूल्यांकन वस्तुत: सीखने की ही एक प्राणाली है, ऐसी प्रणाली जो रंटत प्रणाली से मुक्ति दिला सके परंपरागत साँचे का अनुपालन न करे, अपना ढाँचा निर्मित कर सके इसलिए यह गाँठ बाँध लेना आवश्यक है कि भाषा और साहित्य के प्रश्न बंधे-बंधाए उत्तरों तक सीमित नहीं हो सकते शिक्षक पूर्वनिर्धारित उत्तर कि अपेक्षा नहीं कर सकता विधार्थियों के उत्तर साँचे से हटकर किन्तु तर्क संगत हो सकते हैं और सही भी इस खुलेपन की चुनौती को स्वीकारना आवश्यक

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    सहभागिताशब्द का निर्माण किस उपसर्ग और प्रत्यय से हुआ है?
    Solutions

    उपसर्ग दो शब्दों से मिलकर बना होता है उप+सर्ग। उप का अर्थ होता है समीप और सर्ग का अर्थ होता है सृष्टि करना। उपसर्ग वे शब्द हैं जो अन्य शब्दों के पहले जोड़े जाते हैं और जुड़कर उनके अर्थ में वैशिष्ट्य ला देते हैं।

    उपसर्ग + अन्य शब्द = नया शब्द

    प्रत्यय वे शब्द हैं जो दूसरे शब्दों के अन्त में जुड़कर, अपनी प्रकृति के अनुसार, शब्द के अर्थ में परिवर्तन कर देते हैं।
    अन्य शब्द + प्रत्यय शब्द = नया शब्द
    सहभागिताशब्द का निर्माण सह उपसर्ग और ता प्रत्यय से हुआ है।
    ‘सहभागिता’ = सह + भाग + इता

  • Question 5/9
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    निम्नलिखित गघांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनिए :-

    आज शिक्षक की भूमिका उपदेशक या ज्ञानदाता की-सी नहीं रही वह तो मात्र एक प्रेरक है की शिक्षार्थी स्वयं सीख सकें उनके किशोर मानस को ध्यान में रखकर शिक्षक को अपने शिक्षण कार्य के दौरान अध्ययन अध्यापन की परनपारगत विधियों में दो कदम आगे जाना पड़ेगा, ताकि शिक्षार्थी समकालीन यथार्थ और दिन-प्रतिदिन बदलते जीवन की चुनौतियों के बीच मानव-मूल्यों के प्रति अडिग आस्था बनाए रखने की प्रेरणा ग्रहण कर सके पाठगत बाधाओं को दूर कराते हुए विधार्थियों की सहभागिता को सही दिशा प्रदान करने का कार्य शिक्षक ही कर सकता है

    भाषा शिक्षण की कोई एक विधि नहीं हो सकती जैसे मध्यकालीन कविता में अलंकार, चंदविधान, तुक आदि के प्रति आग्रह था किन्तु आज लय और प्रवाह का महत्व है कविता पढ़ाते समय कवि की युग चेतना के प्रतिसजगता समझना आवश्यक है निबंध में लेखक के दृष्टिकोण और भाषा-शैली का महत्व है और शिक्षार्थी को अर्थग्रहण की योग्यता का विकास जरूरी है कहानी के भीतर बुनी अनेक कहानियों को पहचानने और उन सूत्रों को पल्लवित करने का अभ्यास शिक्षार्थी की कल्पना और अभिव्यक्ति कौशल को बढ़ाने के लिए उपयोगी हो सकता है कभी-कभी कहानी का नाटक में विधा परिवर्तन कर उसका मंचन किया जा सकता है

    मूल्यांकन वस्तुत: सीखने की ही एक प्राणाली है, ऐसी प्रणाली जो रंटत प्रणाली से मुक्ति दिला सके परंपरागत साँचे का अनुपालन न करे, अपना ढाँचा निर्मित कर सके इसलिए यह गाँठ बाँध लेना आवश्यक है कि भाषा और साहित्य के प्रश्न बंधे-बंधाए उत्तरों तक सीमित नहीं हो सकते शिक्षक पूर्वनिर्धारित उत्तर कि अपेक्षा नहीं कर सकता विधार्थियों के उत्तर साँचे से हटकर किन्तु तर्क संगत हो सकते हैं और सही भी इस खुलेपन की चुनौती को स्वीकारना आवश्यक

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    अनुच्छेद में प्रयुक्तसमकालीनशब्द का सबसे उपयुक्त अर्थ होगा-
    Solutions

    अनुच्छेद में प्रयुक्तसमकालीनशब्द का सबसे उपयुक्त अर्थसमसामयिकहोता है।

  • Question 6/9
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    निम्नलिखित गघांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनिए :-

    आज शिक्षक की भूमिका उपदेशक या ज्ञानदाता की-सी नहीं रही वह तो मात्र एक प्रेरक है की शिक्षार्थी स्वयं सीख सकें उनके किशोर मानस को ध्यान में रखकर शिक्षक को अपने शिक्षण कार्य के दौरान अध्ययन अध्यापन की परनपारगत विधियों में दो कदम आगे जाना पड़ेगा, ताकि शिक्षार्थी समकालीन यथार्थ और दिन-प्रतिदिन बदलते जीवन की चुनौतियों के बीच मानव-मूल्यों के प्रति अडिग आस्था बनाए रखने की प्रेरणा ग्रहण कर सके पाठगत बाधाओं को दूर कराते हुए विधार्थियों की सहभागिता को सही दिशा प्रदान करने का कार्य शिक्षक ही कर सकता है

    भाषा शिक्षण की कोई एक विधि नहीं हो सकती जैसे मध्यकालीन कविता में अलंकार, चंदविधान, तुक आदि के प्रति आग्रह था किन्तु आज लय और प्रवाह का महत्व है कविता पढ़ाते समय कवि की युग चेतना के प्रतिसजगता समझना आवश्यक है निबंध में लेखक के दृष्टिकोण और भाषा-शैली का महत्व है और शिक्षार्थी को अर्थग्रहण की योग्यता का विकास जरूरी है कहानी के भीतर बुनी अनेक कहानियों को पहचानने और उन सूत्रों को पल्लवित करने का अभ्यास शिक्षार्थी की कल्पना और अभिव्यक्ति कौशल को बढ़ाने के लिए उपयोगी हो सकता है कभी-कभी कहानी का नाटक में विधा परिवर्तन कर उसका मंचन किया जा सकता है

    मूल्यांकन वस्तुत: सीखने की ही एक प्राणाली है, ऐसी प्रणाली जो रंटत प्रणाली से मुक्ति दिला सके परंपरागत साँचे का अनुपालन न करे, अपना ढाँचा निर्मित कर सके इसलिए यह गाँठ बाँध लेना आवश्यक है कि भाषा और साहित्य के प्रश्न बंधे-बंधाए उत्तरों तक सीमित नहीं हो सकते शिक्षक पूर्वनिर्धारित उत्तर कि अपेक्षा नहीं कर सकता विधार्थियों के उत्तर साँचे से हटकर किन्तु तर्क संगत हो सकते हैं और सही भी इस खुलेपन की चुनौती को स्वीकारना आवश्यक

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    कौन-सा कथन आज के शिक्षक की भूमिका के बारे में सत्य नहीं है?
    Solutions

    प्रस्तुत कथनों  में से शिक्षक की भूमिका के बारे में असत्य कथन है कि परंपरागत शिक्षण विधि को छोड़ा नहीं जा सकता अपितु आज के शिक्षक से अपेक्षा की जाती है कि वह किशोरों को ध्यान में रखकर अपने शिक्षण कार्य के दौरान अध्ययन अध्यापन की परंपरागत विधियों से दो कदम आगे बड़कर विद्यार्थीयों में मानव मूल्यों के प्रति आस्था बराकर रखने में सहायक बने।

  • Question 7/9
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    निम्नलिखित गघांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनिए :-

    आज शिक्षक की भूमिका उपदेशक या ज्ञानदाता की-सी नहीं रही वह तो मात्र एक प्रेरक है की शिक्षार्थी स्वयं सीख सकें उनके किशोर मानस को ध्यान में रखकर शिक्षक को अपने शिक्षण कार्य के दौरान अध्ययन अध्यापन की परनपारगत विधियों में दो कदम आगे जाना पड़ेगा, ताकि शिक्षार्थी समकालीन यथार्थ और दिन-प्रतिदिन बदलते जीवन की चुनौतियों के बीच मानव-मूल्यों के प्रति अडिग आस्था बनाए रखने की प्रेरणा ग्रहण कर सके पाठगत बाधाओं को दूर कराते हुए विधार्थियों की सहभागिता को सही दिशा प्रदान करने का कार्य शिक्षक ही कर सकता है

    भाषा शिक्षण की कोई एक विधि नहीं हो सकती जैसे मध्यकालीन कविता में अलंकार, चंदविधान, तुक आदि के प्रति आग्रह था किन्तु आज लय और प्रवाह का महत्व है कविता पढ़ाते समय कवि की युग चेतना के प्रतिसजगता समझना आवश्यक है निबंध में लेखक के दृष्टिकोण और भाषा-शैली का महत्व है और शिक्षार्थी को अर्थग्रहण की योग्यता का विकास जरूरी है कहानी के भीतर बुनी अनेक कहानियों को पहचानने और उन सूत्रों को पल्लवित करने का अभ्यास शिक्षार्थी की कल्पना और अभिव्यक्ति कौशल को बढ़ाने के लिए उपयोगी हो सकता है कभी-कभी कहानी का नाटक में विधा परिवर्तन कर उसका मंचन किया जा सकता है

    मूल्यांकन वस्तुत: सीखने की ही एक प्राणाली है, ऐसी प्रणाली जो रंटत प्रणाली से मुक्ति दिला सके परंपरागत साँचे का अनुपालन न करे, अपना ढाँचा निर्मित कर सके इसलिए यह गाँठ बाँध लेना आवश्यक है कि भाषा और साहित्य के प्रश्न बंधे-बंधाए उत्तरों तक सीमित नहीं हो सकते शिक्षक पूर्वनिर्धारित उत्तर कि अपेक्षा नहीं कर सकता विधार्थियों के उत्तर साँचे से हटकर किन्तु तर्क संगत हो सकते हैं और सही भी इस खुलेपन की चुनौती को स्वीकारना आवश्यक

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    शिक्षक से किस प्रकार की बाधाएँ दूर करने की अपेक्षा की गई है?
    Solutions

    गद्यांश से, पाठगत बाधाओं को दूर कराते हुए विधार्थियों की सहभागिता को सही दिशा प्रदान करने का कार्य शिक्षक ही कर सकता है

  • Question 8/9
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    निम्नलिखित गघांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनिए :-

    आज शिक्षक की भूमिका उपदेशक या ज्ञानदाता की-सी नहीं रही वह तो मात्र एक प्रेरक है की शिक्षार्थी स्वयं सीख सकें उनके किशोर मानस को ध्यान में रखकर शिक्षक को अपने शिक्षण कार्य के दौरान अध्ययन अध्यापन की परनपारगत विधियों में दो कदम आगे जाना पड़ेगा, ताकि शिक्षार्थी समकालीन यथार्थ और दिन-प्रतिदिन बदलते जीवन की चुनौतियों के बीच मानव-मूल्यों के प्रति अडिग आस्था बनाए रखने की प्रेरणा ग्रहण कर सके पाठगत बाधाओं को दूर कराते हुए विधार्थियों की सहभागिता को सही दिशा प्रदान करने का कार्य शिक्षक ही कर सकता है

    भाषा शिक्षण की कोई एक विधि नहीं हो सकती जैसे मध्यकालीन कविता में अलंकार, चंदविधान, तुक आदि के प्रति आग्रह था किन्तु आज लय और प्रवाह का महत्व है कविता पढ़ाते समय कवि की युग चेतना के प्रतिसजगता समझना आवश्यक है निबंध में लेखक के दृष्टिकोण और भाषा-शैली का महत्व है और शिक्षार्थी को अर्थग्रहण की योग्यता का विकास जरूरी है कहानी के भीतर बुनी अनेक कहानियों को पहचानने और उन सूत्रों को पल्लवित करने का अभ्यास शिक्षार्थी की कल्पना और अभिव्यक्ति कौशल को बढ़ाने के लिए उपयोगी हो सकता है कभी-कभी कहानी का नाटक में विधा परिवर्तन कर उसका मंचन किया जा सकता है

    मूल्यांकन वस्तुत: सीखने की ही एक प्राणाली है, ऐसी प्रणाली जो रंटत प्रणाली से मुक्ति दिला सके परंपरागत साँचे का अनुपालन न करे, अपना ढाँचा निर्मित कर सके इसलिए यह गाँठ बाँध लेना आवश्यक है कि भाषा और साहित्य के प्रश्न बंधे-बंधाए उत्तरों तक सीमित नहीं हो सकते शिक्षक पूर्वनिर्धारित उत्तर कि अपेक्षा नहीं कर सकता विधार्थियों के उत्तर साँचे से हटकर किन्तु तर्क संगत हो सकते हैं और सही भी इस खुलेपन की चुनौती को स्वीकारना आवश्यक

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    आधुनिक कविता में महत्वपूर्ण है।
    Solutions
    गद्यांश से, मध्यकालीन कविता में अलंकारचंदविधानतुक आदि के प्रति आग्रह था किन्तु आज लय और प्रवाह का महत्व है कविता पढ़ाते समय कवि की युग चेतना के प्रतिसजगता समझना आवश्यक है
  • Question 9/9
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    निम्नलिखित गघांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनिए :-

    आज शिक्षक की भूमिका उपदेशक या ज्ञानदाता की-सी नहीं रही वह तो मात्र एक प्रेरक है की शिक्षार्थी स्वयं सीख सकें उनके किशोर मानस को ध्यान में रखकर शिक्षक को अपने शिक्षण कार्य के दौरान अध्ययन अध्यापन की परनपारगत विधियों में दो कदम आगे जाना पड़ेगा, ताकि शिक्षार्थी समकालीन यथार्थ और दिन-प्रतिदिन बदलते जीवन की चुनौतियों के बीच मानव-मूल्यों के प्रति अडिग आस्था बनाए रखने की प्रेरणा ग्रहण कर सके पाठगत बाधाओं को दूर कराते हुए विधार्थियों की सहभागिता को सही दिशा प्रदान करने का कार्य शिक्षक ही कर सकता है

    भाषा शिक्षण की कोई एक विधि नहीं हो सकती जैसे मध्यकालीन कविता में अलंकार, चंदविधान, तुक आदि के प्रति आग्रह था किन्तु आज लय और प्रवाह का महत्व है कविता पढ़ाते समय कवि की युग चेतना के प्रतिसजगता समझना आवश्यक है निबंध में लेखक के दृष्टिकोण और भाषा-शैली का महत्व है और शिक्षार्थी को अर्थग्रहण की योग्यता का विकास जरूरी है कहानी के भीतर बुनी अनेक कहानियों को पहचानने और उन सूत्रों को पल्लवित करने का अभ्यास शिक्षार्थी की कल्पना और अभिव्यक्ति कौशल को बढ़ाने के लिए उपयोगी हो सकता है कभी-कभी कहानी का नाटक में विधा परिवर्तन कर उसका मंचन किया जा सकता है

    मूल्यांकन वस्तुत: सीखने की ही एक प्राणाली है, ऐसी प्रणाली जो रंटत प्रणाली से मुक्ति दिला सके परंपरागत साँचे का अनुपालन न करे, अपना ढाँचा निर्मित कर सके इसलिए यह गाँठ बाँध लेना आवश्यक है कि भाषा और साहित्य के प्रश्न बंधे-बंधाए उत्तरों तक सीमित नहीं हो सकते शिक्षक पूर्वनिर्धारित उत्तर कि अपेक्षा नहीं कर सकता विधार्थियों के उत्तर साँचे से हटकर किन्तु तर्क संगत हो सकते हैं और सही भी इस खुलेपन की चुनौती को स्वीकारना आवश्यक

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    कहानी के द्वारा लेखन विद्यार्थियों में कल्पनशीलता और अभिव्यक्ति की कुशलता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण गतिविधि हो सकती है।
    Solutions

    कहानी के द्वारा लेखक विद्यार्थीयों में कल्पनाशीलता और अभिव्यक्ति की कुशलता बढाने के लिए महत्वपूर्ण गतिविधि हो सकती है। साथ ही विद्यार्थियों के व्यक्ति में निहित कथासूत्रों का पल्लवन कर उनकी मानव मूल्यों में आस्था को सहज ही मजबूत कर सकती है।

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